राम मेरे आराध्य ही नहीं मेरे पथप्रदर्शक भी हैं। रामकथा और वैराग्य की साधना पर महामंलेश्वर साध्वी अन्नपूर्णा माता से विशेष बातचीत।
रीवा जिले के गुढ़ क्षेत्र अंतर्गत ग्राम डढ़वा बांधी स्थित महावीरननाथ स्वामी परिसर में स्वामी सच्चाबाबा अरैल प्रयागराज की स्मृति में 26 फरवरी से 2 मार्च 2026 तक पंच दिवसीय श्रीराम कथा एवं महाप्रसाद का आयोजन किया जाएगा। कथा का वाचन प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से सायं 6 बजे तक होगा। समापन अवसर पर 2 मार्च, सोमवार को दोपहर 2:30 बजे से भंडारे का आयोजन रखा गया है।
प्रश्न- माता जी आपने बाल्यावस्था में ही वैराग्य का मार्ग क्यों और कैसे अपनाया।
उत्तर- बचपन से ही मन में ईश्वर के प्रति गहरी आस्था थी। सांसारिक आकर्षण कभी मन को बांध नहीं पाए। राम नाम का जप करते.करते भीतर एक अलग ही शांति अनुभव होती थी। गुरुकृपा से समझ आया कि जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं बल्कि योग है। उसी प्रेरणा से वैराग्य का मार्ग अपनाया और स्वयं को प्रभु श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया।
प्रश्न- राम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता आप क्या मानती हैं।
उत्तर-भगवान श्रीराम का चरित्र मर्यादा, करुणा और कर्तव्य का अद्भुत संगम है। वे राजा होकर भी विनम्र रहे पुत्र होकर आज्ञाकारी रहे और मित्र होकर समर्पित रहे। उन्होंने हमें सिखाया कि परिस्थितियां कैसी भी हों धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। राम केवल देवता नहीं जीवन जीने की सर्वोत्तम प्रेरणा हैं।
प्रश्न- आज के युवाओं को राम के चरित्र से क्या सीख लेनी चाहिए।
उत्तर- आज के युवा यदि राम के जीवन से एक भी गुण अपना लें जैसे अनुशासन, संयम और माता.पिता के प्रति सम्मान,तो समाज में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। राम ने संघर्षों से भागने के बजाय उन्हें स्वीकार किया। युवाओं को भी चुनौतियों का सामना धैर्य और सकारात्मकता से करना चाहिए।
प्रश्न- आपकी दृष्टि में रामकथा का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर- रामकथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है यह आत्मशुद्धि का माध्यम है। कथा सुनते.सुनते मन के विकार स्वतः शांत होने लगते हैं। परिवारों में प्रेम बढ़ता है। समाज में सद्भावना आती है। जहां रामकथा होती है वहां वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा और संस्कारों की सुगंध फैल जाती है।
प्रश्न- आपके लिए राम कौन हैं।
उत्तर- मेरे लिए राम जीवन की श्वास हैं। वे मेरे आराध्य ही नहीं मेरे पथप्रदर्शक भी हैं। जब भी जीवन में कोई निर्णय लेना होता है मैं स्वयं से पूछती हूं,क्या यह राम की मर्यादा के अनुरूप है। राम मेरे भीतर की चेतना हैं और उन्हीं की कृपा से कथा कहने का सौभाग्य प्राप्त होता है।


