जिस सीढी से शिखर तक पहुंचे उसी की नींव खोदने लगे!
गुढ की राजनीति में एहसान, महत्वाकांक्षा और आरोपों का ऐसा संगम कि कहावत भी शर्मा जाए….मेरी ही बिल्ली और मुझसे ही म्याऊँ!
राजनीति भी बड़ा अजीब खेल है। यहाँ स्थायी न दोस्त होते हैं न दुश्मन। केवल हित और समय स्थायी होते हैं। जिस सीढ़ी का सहारा लेकर लोग ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं, अक्सर सबसे पहले उसी सीढ़ी को खोद डालते हैं। यह कहानी किसी दूर प्रदेश की नहीं बल्कि रीवा जिले के गुढ क्षेत्र की राजनीति की है।
गुढ के विधायक नागेंद्र सिंह को राजनीति का चाणक्य माना जाता है। वर्ष 2003 से भाजपा के विधायक रहे नागेंद्र सिंह ने कई राजनीतिक चेहरों को अवसर दिया। एक बाहरी डॉक्टर को गुढ में स्थापित होने में सहयोग किया, फिर उनकी पत्नी डॉ अर्चना सिंह को राजनीति में आगे बढ़ाया। नगर पंचायत अध्यक्ष बनाने के लिए विरोध भी झेला, मेहनत भी की और राजनीतिक पूंजी भी खर्च की
लेकिन राजनीति में एक पुरानी कहावत है,मेरी ही बिल्ली और मुझसे ही म्याऊँ। जिस हाथ ने सहारा दिया, आज उसी पर सवाल उठ रहे हैं। जिस नेतृत्व ने आगे बढ़ाया, वही अब आरोपों के घेरे में है। नगर पंचायत अध्यक्ष डॉ अर्चना सिंह के खिलाफ 13 पार्षद मोर्चा खोल चुके हैं। कुर्सी डगमगाई तो आरोपों और प्रत्यारोपों की बौछार शुरू हो गई।
कभी ऐसा दौर था कि गुढ में चर्चा होती थी कि अध्यक्ष जी के इशारे पर तहसीलदार से लेकर थाना प्रभारी तक की नियुक्ति प्रभावित हो जाती है। आज वही राजनीतिक ताकत सवालों के घेरे में है और आरोपों की आग चारों ओर फैली हुई है।
राजनीति का यही सबसे बड़ा व्यंग्य है जब तक नाव किनारे लगा रही हो, मल्लाह देवता लगता है, किनारे पहुँचते ही वही सबसे बड़ा दोषी दिखने लगता है। गुढ की राजनीति फिलहाल इसी व्यंग्य का जीवंत उदाहरण बन गई है।
छीः छीः! राजनीति तेरे रंग भी निराले हैं।
आशुतोष द्विवेदी


