गुढ़ की राजनीति में “पानी वाली” राजनीति, अब किसे पिलाएं पानी और किससे मांगें माफी
गुढ़ की राजनीति भी गजब है। यहां ऊंट भी गढ़ी पर चढ़ जाता है और राजा भी पल भर में पैदल हो जाता है। यहां की जनता कब किसे सिर पर बिठा दे और कब उतार दे, इसका अंदाजा बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी नहीं लगा पाते।
कहावत है, जब चिड़िया चुग गई खेत, तब पछताने से क्या फायदा।
गुढ़ की राजनीति देखकर लगता है कि अब यह कहावत फिर से प्रासंगिक हो गई है।
डॉ. अर्चना सिंह उर्फ कल्याणी कभी सहानुभूति की लहर पर राजनीति में आईं। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि लोगों ने साथ दिया, नेताओं ने हाथ थामा और राजनीति की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं। जिन लोगों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज उन्हीं पर उंगली उठाने की कोशिश हो रही है।
राजनीति में इसे ही शायद “गुरु दक्षिणा का आधुनिक संस्करण” कहा जाता होगा।
उधर नगर पंचायत का हाल देखिए। शहर कचरे से परेशान है, नालियां अपनी किस्मत पर रो रही हैं, पार्षद रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस की मुद्रा में रहते हैं। लेकिन अध्यक्ष जी ऐसे मस्त हैं, जैसे सब कुछ स्विट्जरलैंड की तरह चमचमा रहा हो।
अब खबर है कि अविश्वास प्रस्ताव की आहट सुनाई दे रही है। ऐसे में अध्यक्ष जी का दर्द भी समझिए। वार्डों के पार्षद ही साथ नहीं आ रहे, लेकिन दोष किसी और पर मढ़ा जा रहा है । राजनीति का यह नया गणित शायद गुढ़ में ही पढ़ाया जाता होगा।
गुढ़ की जनता भी कमाल है। वह सब देखती है, सब समझती है और चुनाव आने पर बिना बताए रिपोर्ट कार्ड भी बांट देती है। इसलिए आरोपों की राजनीति से ज्यादा जरूरी है कि शहर की नालियां साफ हों, सड़कें चमकें और जनता मुस्कुराए।
वरना जनता भी कह देगी – पानी तो सबको पिलाया, लेकिन अपनी राजनीति की नाव में ही छेद कर लिया!
और अंत में सिर्फ इतना…
छी… छी…! अध्यक्ष जी राजनीति सेवा से चलती है, केवल बयानबाजी से नहीं। गुढ़ की जनता अब भाषण नहीं, काम का हिसाब मांग रही है। तो आपके पेट में मरोड़ होने लगी।
अब अपने मूल को लौट जाइए और कभी गाना गाइए
चल उड़ जा रे पँछी अब गुढ़ हुआ बेगाना.. इसमें मजा न आए तो पीठ में झोला रखकर गाते हुए निकल जाएं… छूटा गया गुढ़ अब मूल के हो गए.. आगे का अंक पढ़ते रहें।


