एक विराट व्यक्तित्व का अवसान और उसके जीवन से जुड़े किस्से जो सुनाए जाएंगे।
कुछ लोग केवल जीवन नहीं जीते, वे अपने पीछे एक विचार, एक परंपरा और एक संस्कार छोड़ जाते हैं। ऐसे ही विराट व्यक्तित्व थे ग्राम बांधी डढ़वा तहसील गुढ निवासी स्वर्गीय भागवत द्विवेदी जिन्होंने 75 वर्षों का जीवन सिद्धांत धर्म, अनुशासन और आत्मसम्मान के साथ जिया।
बचपन से ही उन्हें पढ़ने का गहरा शौक था। हर बात को तर्क और ज्ञान की कसौटी पर परखना उनकी आदत थी। वेद पुराणों का अद्भुत ज्ञान, धर्म के प्रति अटूट आस्था और जीवन में अनुशासन ऐसा कि बिना पूजा पाठ किए कभी अन्न जल ग्रहण नहीं किया। सुबह 4 बजे उठना, स्नान ध्यान, पूजा और फिर दिनचर्या यह क्रम अंतिम समय तक नहीं टूटा।
चार वर्ष पूर्व जब चिकित्सकों ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जानकारी दी तब भी उन्होंने हार नहीं मानी। कठिन उपचार चला, पीड़ा आई, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति बीमारी से कहीं अधिक मजबूत निकली। वे कैंसर जैसी बीमारी को हराकर वापस लौटे। पर नियति को कुछ और मंजूर था। अचानक उन्हे ब्रेन हेमरेज हुआ, जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष चलता रहा और 24 मई को उन्होंने अंतिम सांस ली।
वे पांच पुत्रों के पिता थे। यह परिवार उनके संस्कारों की सबसे बड़ी पूंजी है। पुत्रों ने तन, मन और धन से पिता की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। जिस चीज की आवश्यकता पड़ी, उसे तुरंत उपलब्ध कराया। यह केवल सेवा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों का जीवंत उदाहरण था।
उनकी धर्मपत्नी भी अत्यंत धार्मिक और सहनशील स्वभाव की थीं। परिवार के लोग बताते हैं कि वे कभी किसी बात का बुरा नहीं मानती थीं। पति चाहे कितना भी नाराज हों, वे मुस्कुराकर हर परिस्थिति को शांत कर देती थीं। दोनों का रिश्ता केवल दांपत्य नहीं, बल्कि विश्वास और तपस्या का संगम था।
धर्म के प्रति उनकी आस्था इतनी गहरी थी कि डॉक्टरों ने बीमारी के दौरान समय पर भोजन और दवा लेने की सलाह दी, लेकिन उनका उत्तर हमेशा यही होता था पहले पूजा होगी, फिर अन्न जल और दवा।
लगातार 12 वर्षों तक प्रयागराज में माघ मास के दौरान कल्पवास करना उनके आध्यात्मिक जीवन का बड़ा प्रमाण है। कैंसर के बाद भी जब परिवार ने उन्हें प्रयागराज जाने से रोका तब भी वे नहीं माने। उन्होंने अपनी नियमित साधना और धर्म को कभी नहीं छोड़ा।
अभी कुछ समय पहले ही उन्होंने अपने पोते का विवाह बड़े उत्साह और प्रसन्नता से संपन्न कराया था। पोते पोतियों से उनका स्नेह इतना गहरा था कि आज पूरा परिवार स्वयं को असहाय महसूस कर रहा है।
उन्होंने जीवनभर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। नुकसान सह लिया, लेकिन गलत के सामने कभी झुके नहीं। उनका स्वभाव दृढ़ था, विचार स्पष्ट थे और आत्मसम्मान अटूट।
आज उनका जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक युग, एक परंपरा और एक विचारधारा का अवसान है। ऐसे व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं जो अपने जीवन से आने वाली पीढ़ियों को संस्कार और आत्मबल दे जाते हैं। ऐसे व्यक्तित्व को कोटि कोटि नमन।
ईश्वर पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिवार को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।


