महिला आरक्षण विधेयक एक ऐतिहासिक गतिरोध
विशेष आलेख
17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय संसद के इतिहास में एक अजीब दोहरेपन के साथ दर्ज होगा। एक तरफ, सदन में महिला सशक्तीकरण पर शायद सबसे लंबी बहस हुई। करीब 21 घंटे, 130 सांसद, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल थीं। और दूसरी तरफ, नतीजा शून्य।
संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के चुनावों से देने का प्रावधान करता था, पक्ष में 298 और विरोध में 230 मतों के साथ गिर गया। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 मतों की ज़रूरत थी सरकार 54 मतों से चूक गई।
सरकार का कहना था हमारी महिला सशक्तीकरण की मंशा
सरकार की दलील थी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ानी है, और इसके लिए संवैधानिक आरक्षण ज़रूरी है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार लड़ेगी और महिलाओं को आरक्षण देकर रहेगी। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे केवल इसलिए विरोध कर रहे हैं ताकि सत्तापक्ष को इसका श्रेय न मिले।
पिछले 11 वर्षों में यह पहला मौका था जब केंद्र सरकार लोकसभा में कोई अहम विधेयक पारित नहीं करवा सकी। यह सरकार के लिए निस्संदेह एक बड़ा राजनीतिक झटका है।
विपक्ष का कहना है कि सरकार महिला आरक्षण चाहती है या परिसीमन?
विपक्ष का विरोध महिला आरक्षण के विचार से नहीं, बल्कि इस विधेयक की संरचना से था। राहुल गांधी ने कहा कि यदि सरकार सच में महिला आरक्षण चाहती है, तो 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करे, जिसमें विपक्ष पूरा सहयोग देगा। उनका तर्क था कि यह नया विधेयक महिलाओं के नाम पर देश का चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश है।
समाजवादी पार्टी, डीएमके और शिरोमणि अकाली दल ने भी परिसीमन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए किस जनगणना का आधार लिया जाएगा, कितनी सीटें बढ़ेंगी, और किसे फायदा होगा?
सरकार एक साथ 3 विधेयक ले कर आई।
यही इस पूरे विवाद की जड़ है। सरकार तीन विधेयक एक साथ लाई थी संविधान (131वां) संशोधन विधेयक (महिला आरक्षण के लिए), परिसीमन विधेयक 2026 (लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए), और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक 2026 (केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा)।
संविधान संशोधन विधेयक गिरते ही बाकी दोनों विधेयक भी वापस ले लिए गए। विपक्ष का कहना था कि परिसीमन और महिला आरक्षण को एक ही पैकेज में बांधना उचित नहीं, एक नैतिक प्रश्न को राजनीतिक हित से जोड़ा गया।
वो सवाल जो कोई नहीं पूछता
इस पूरी बहस में एक बुनियादी सवाल दब गया अगर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना है, तो सीटें बढ़ाने की ज़रूरत क्यों?
आज लोकसभा में 543 सीटें हैं। इनमें से 33 प्रतिशत यानी लगभग 179 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती थीं बिना किसी परिसीमन के, बिना किसी नए नक्शे के, बिना किसी उलझन के। लेकिन सरकार का प्रस्ताव था पहले सीटें बढ़ाओ, फिर आरक्षण दो।
तो सवाल उठता है सीटें बढ़ाने की इतनी जल्दी क्यों?
2023 में जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, वह मौजूदा 543 सीटों पर ही लागू हो सकता था बशर्ते जनगणना हो। वह जनगणना आज तक नहीं हुई। अगर सरकार की नीयत साफ थी, तो पहला कदम वही होता।
कौन सही, कौन गलत?
सच यह है कि दोनों पक्षों के पास वैध तर्क हैं, और दोनों पर सवाल भी उठते हैं।
सरकार से पूछा जाना चाहिए 2023 का कानून लागू करने के लिए जनगणना क्यों नहीं हुई? अगर महिला आरक्षण की इतनी प्रतिबद्धता है, तो पहले पारित कानून को अमल में लाना पहला कदम होना चाहिए था।
विपक्ष से पूछा जाना चाहिए अगर परिसीमन अलग से भी लाया जाता, तो क्या विरोध नहीं होता? और यदि 2023 का कानून सही था, तो उसे लागू कराने के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया गया?
आगे क्या?
सरकार ने संकेत दिया है कि भविष्य में इस विषय पर फिर से प्रयास किया जाएगा। लेकिन 2029 के चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, और यह मुद्दा अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका है, जिसे दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल करेंगे।
असली नुकसान? वे करोड़ों महिलाएं, जो संसद में अपना चेहरा देखना चाहती थीं, और जो इस बहस में महज़ एक मोहरा बनकर रह गईं।
बात यह नहीं कि विधेयक बुरा था बात यह है कि महिला आरक्षण और सीट विस्तार, दो अलग-अलग मुद्दे थे जिन्हें जानबूझकर एक साथ लाया गया। जब तक महिला आरक्षण राजनीतिक सहमति का नहीं, बल्कि राजनीतिक श्रेय का विषय बना रहेगा तब तक 33 फ़ीसद का सपना, सपना ही रहेगा।


