विंध्य की उपेक्षा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ससुराल में सन्नाटा, प्रदेश युवा मोर्चा की सूची से विंध्य लापता?
ससुराल सूनी, दरबार रंगीन, विंध्य के हिस्से फिर आई बेबसी की जमीन।
न जाने क्यूं हमारे दिल को तूने दिल नही समझा,
ये सीसा तोड़ डाला तूने, हमे प्यार के काबिल नही समझा।
रात गहरी थी, सूची लंबी थी, नाम चमकदार थे। बस एक चीज गायब थी, विंध्य क्षेत्र का सम्मान। प्रदेश युवा मोर्चा की नई टीम आई और आई भी ऐसे जैसे किसी ने आईना तो दिखाया पर चेहरा देखने लायक छोड़ा ही नहीं। विंध्य के युवाओं ने सूची पढ़ी, फिर दोबारा पढ़ी, फिर सोचा शायद गलती से छूट गया होगा। लेकिन नहीं, इस बार तो पूरी कहानी ही गायब। जिन किरदारों द्वारा लिखी गई थी। हमने सोचा था कि कुछ तो मिलेगा इनाम वफादारी का, पर यहां तो हिस्सा ही काट दिया गया हिस्सेदारी का।
रीवा, सीधी, सतना, सिंगरौली, शहडोल उमरिया अनूपपुर मैहर, मऊगंज के एक भी युवा के नाम ही नही प्रदेश युवा मोर्चा टीम में। जबकि उम्मीदें भी सबकी थीं पर सूची में जगह किसी की नहीं मिली। अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए।

प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव, जिनकी ससुराल खुद रीवा में है। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि ससुराल और मायका कभी खाली नहीं छोड़ा जाता।
पर यहां तो ससुराल भर सूनी नही हुई अड़ोसी पड़ोसी को भी सूना कर दिया गया।

जहां रिश्तों की लाज रखी जाती है, वहां रिवाज निभाए जाते हैं, पर इस दरबार में तो अपने ही बेगाने बनाए जाते हैं। विंध्य वही है जिसने 2018 में सत्ता की तस्वीर बदली थी। जब पूरे प्रदेश में समीकरण डगमगा रहे थे तब विंध्य ने सबसे ज्यादा सीटें देकर सत्ता की नींव मजबूत की। लेकिन सत्ता की कुर्सी मजबूत होते ही विंध्य की पकड़ क्यों ढीली कर दी गई। हमने जिनको ताज दिया, वो हमें पहचान न सके। हमने जिनको आसमां दिया, वो हमें उड़ान न दे सके।
आज विंध्य में हवाई जहाज उतर रहे हैं, रेल की पटरियां फैल रही हैं, विकास की गाथाएं लिखी जा रही हैं, पर राजनीति की किताब में विंध्य का पन्ना बार बार क्यों फाड़ दिया जाता है। क्या यहां के युवा सिर्फ पोस्टर लगाने के लिए हैं?
क्या ये सिर्फ भीड़ हैं नेतृत्व नहीं।
सबसे बड़ा सवाल
क्या ये सब कुछ डॉक्टर मोहन यादव की जानकारी के बिना हुआ है या फिर ये वही खामोशी है जो बहुत कुछ कहती है। खामोशी भी यहां अब सवाल करने लगी है। वफादारी खुद अपनी मिसाल देने लगी है, पर जवाब कहीं से आता नहीं। शायद ससुराल का दर्द अब दिखता नहीं, जनाब। राजनीति में उपेक्षा कभी छोटी नहीं होती।
ये धीरे धीरे असंतोष बनती है, फिर आवाज बनती है और एक दिन फैसला भी। फिलहाल विंध्य चुप है, लेकिन ये वही खामोशी है जो आने वाले समय में सबसे तेज गूंज बन सकती है।


